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Saturday, 5 November 2016

Chhath Vrat Katha- छठ व्रत कथा


छठ व्रत और पर्व सूर्य भगवान को समर्पित एक विशेष त्योहार है। भारत के कई जगहों में खासकर बिहार और यूपी में इस पर्व को महापर्व माना जाता है। पवित्रता, शुद्धता और  स्वच्छता के साथ मनाया जाने वाला छठ पर्व आदिकाल से मनाया जाता है। इस पर्व में छठी माता की पूजा की जाती  है और उनसे संतान की रक्षा और बचाव  का वर मांगा जाता है। शुक्ल पक्ष कार्तिक माह की षष्ठी तिथि को मनाए जाने वाले छठ पर्व का उल्लेख भविष्य पुराण में सूर्य षष्ठी के रूप में है। हालांकि मान्यताओं के अनुसार सूर्य छठ व्रत या षष्ठी की शुरुआत रामायण काल से हुई थी। इस व्रत को सीता माता और द्वापर युग में द्रौपदी ने भी किया था।   


छठ व्रत कथा के अनुसार- प्रियव्रत नाम के एक राजा था और उनकी पत्नी का नाम मालिनी था। परंतु दोनों की कोई संतान न थी और वे बहुत दुखी रहते थे। उन्होंने संतान प्राप्ति हेतु महर्षि कश्यप द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया। इस यज्ञ के फलस्वरूप रानी गर्भवती हो गई। ९ महीने बाद संतान सुख प्राप्त करने का अवसर आया तो रानी का पुत्र मरा हुआ हुआ। इस बात से राजा प्रियव्रत को बहुत दुख हुआ। संतान शोक में राजा ने आत्म हत्या का मन बना लिया। परंतु जैसे ही प्रियव्रत ने आत्महत्या करने की कोशिश की उनके सामने एक दिव्य देवी प्रकट हुईं। 


देवी ने राजा प्रियव्रत को कहा कि "मैं षष्टी देवी हूं"। मैं लोगों को संतान आनंद का सौभाग्य प्रदान करती हूं। इसके अलावा जो सच्चे मन और भाव से मेरी पूजन करता है मैं उसके सभी प्रकार के आकांक्षा को पूर्ण करती हूं। यदि तुम मेरी पूजा सच्चे मन से करोगे तो मैं तुम्हें संतान रत्न प्रदान करूंगी।" 

षष्ठी देवी की बातों से प्रभावित होकर राजा ने देवी माता का आज्ञा का पालन किया।  राजा और उनकी पत्नी मालिनी ने कार्तिक शुक्ल की षष्टी तिथि में देवी षष्टी की सच्चे मन से और पूरे विधि -विधान से पूजा की। इस पूजा के फलतः उन्हें एक सुंदर पुत्र की प्राप्ति हुई। तभी से छठ पर्व मनाया जाने लगा।  एक अन्य कथा के अनुसार जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए, तब द्रौपदी ने इस व्रत को रखा। इस व्रत के परिणाम से उनकी सारी मनोकामनाएं पूरी हुईं तथा पांडवों को राजपाट वापस मिल गया।